धर्म और अधर्म — ये दो शब्द केवल आस्था के प्रतीक नहीं, बल्कि जीवन की दो विपरीत दिशाएँ हैं।
धर्म वह शक्ति है जो हमें सत्य, न्याय, करुणा और सदाचार की ओर ले जाती है,
जबकि अधर्म वह मार्ग है जो अहंकार, स्वार्थ, हिंसा और अन्याय की ओर गिरा देता है।
धर्म का अर्थ केवल पूजा-पाठ या किसी पंथ का पालन नहीं है।
वास्तव में, धर्म वह आचरण है जो किसी को पीड़ा न दे और सबके हित में हो।
जो कर्म मन, वचन और व्यवहार से शुद्ध हो — वही धर्म है।
इसके विपरीत, अधर्म वह है जो दूसरों को कष्ट पहुँचाए, असत्य का समर्थन करे और लोभ-क्रोध से प्रेरित हो।
अधर्म का मार्ग भले ही क्षणिक सुख दे, पर अंत में वह दुःख और विनाश का कारण बनता है।
भगवद्गीता में भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं —
> “जब-जब धर्म की हानि और अधर्म की वृद्धि होती है, तब-तब मैं अवतार लेता हूँ।”
यह वचन हमें बताता है कि धर्म सृष्टि की नींव है, और अधर्म उसका पतन।
धर्म वह दीपक है जो अंधकार में भी मार्ग दिखाता है,
और अधर्म वह छाया है जो प्रकाश को छिपा देती है।
यदि हम अपने विचारों, वचनों और कर्मों में सत्य, प्रेम और करुणा लाते हैं,
तो हम धर्म के मार्ग पर हैं — अन्यथा अधर्म अपने आप हावी हो जाता है।
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🌸 निष्कर्ष:
धर्म और अधर्म का अंतर बाहर नहीं, हमारे भीतर है।
जब हमारा मन शांत, हृदय करुणामय और कर्म निस्वार्थ होते हैं,
तब हम धर्म में हैं।
और जब स्वार्थ, घृणा या अन्याय हृदय पर हावी हो जाए — वही अधर्म है।
धर्म को अपनाना कोई कठिन साधना नहीं —
यह बस हर दिन, हर क्षण सत्य और प्रेम से जीने का निर्णय है।
कल्कि साधना केंद्र —

