मानव शरीर की सात धातुएँ (Ayurveda’s Seven Dhatus)
आयुर्वेद के अनुसार मानव शरीर का निर्माण सात मूल धातुओं से होता है।
ये धातुएँ शरीर की संरचना, पोषण, शक्ति, प्रतिरोधक क्षमता और दीर्घायु की आधारशिला मानी जाती हैं।
धातुओं का संतुलन स्वास्थ्य, और उनमें विकृति रोग का कारण बनती है।
आइए इन सातों धातुओं को सरल भाषा में समझते हैं—
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1. रस धातु — (Plasma / पोषक द्रव)
रस धातु भोजन के सार भाग से बनती है और पूरे शरीर का पोषण करती है।
यह हृदय, रक्त-संचार, त्वचा की चमक और प्रतिरक्षा प्रणाली का आधार है।
रस का असंतुलन थकान, कमजोरी और त्वचा-संबंधी समस्याएँ पैदा करता है।
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2. रक्त धातु — (Blood / रक्त)
रक्त धातु जीवन ऊर्जा (प्राण शक्ति) को शरीर के प्रत्येक अंग तक पहुँचाती है।
यह गर्मी, रंग, उत्साह और बल प्रदान करती है।
रक्त की विकृति से पित्त रोग, त्वचा रोग, रक्तहीनता आदि उत्पन्न होते हैं।
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3. मांस धातु — (Muscle / मांसपेशियाँ)
मांस धातु शरीर को आकार, स्थिरता और शक्ति प्रदान करती है।
स्वस्थ मांस धातु व्यक्ति को उर्जा, सहनशीलता और शारीरिक बल देती है।
इसकी कमी से शरीर दुबला और कमजोर होता है, जबकि वृद्धि मोटापा या गठानें उत्पन्न कर सकती है।
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4. मेद धातु — (Fat / चर्बी)
मेद धातु शरीर में स्निग्धता, स्नेह, चिकनाई, उष्णता-संतुलन और ऊर्जा संचय का कार्य करती है।
अधिमेद (अधिक मेद) मोटापा, मधुमेह और ह्रदय रोगों का कारण बनता है,
जबकि कम मेद कमजोरी, सूखापन और ठंड-संवेदनशीलता देता है।
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5. अस्थि धातु — (Bone / अस्थि)
अस्थि धातु शरीर की संरचना, मजबूती और धारण-शक्ति का आधार है।
यह हड्डियाँ, दाँत, नाखून और बाल के मूल को पोषण देती है।
विकृति होने पर अस्थि-दर्द, कमजोर हड्डियाँ, दाँतों की समस्या और बाल झड़ना जैसी स्थितियाँ उत्पन्न होती हैं।
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6. मज्जा धातु — (Bone Marrow / स्नायु-द्रव)
मज्जा धातु हड्डियों के भीतर स्थित द्रव और स्नायविक तंत्र से संबंधित है।
यह तंत्रिका-शक्ति, स्मरण शक्ति, स्थिरता और मानसिक संतुलन में सहायक है।
मज्जा की कमी से कमजोरी, चिंता, नसों का दर्द और स्मरण-क्षमता में कमी आती है।
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7. शुक्र धातु — (Reproductive Tissue / प्रजनन धातु)
शुक्र धातु शरीर की अंतिम और अत्यंत सूक्ष्म धातु है, जो ओज, तेज, उत्साह, बल और प्रजनन शक्ति प्रदान करती है।
यह मनोबल, व्यक्तित्व और आयुर्धारण में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
शुक्र धातु की विकृति से थकान, निराशा, प्रजनन समस्याएँ और ओज में कमी आती है।
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धातुओं का संतुलन ही स्वास्थ्य
आयुर्वेद कहता है—
“धातु सम्यक् — स्वास्थ्य, धातु विकृति — रोग।”
जब ये सातों धातुएँ उचित मात्रा, उचित कार्य और उचित अवस्था में होती हैं
तो शरीर संतुलित, मन शांत और जीवन ऊर्जावान रहता है।
सही भोजन, सही दिनचर्या, योग-साधना, ध्यान और सात्त्विक जीवनशैली
धातुओं को संतुलित रखने के प्रमुख साधन हैं।

