धर्म के दस लक्षण – समझिए

धर्म के दस लक्षण — मनुस्मृति का शाश्वत संदेश 🌿

📜 श्लोक (मनुस्मृति 6/92)

धृति: क्षमा दमस्तेयं शौचमिन्द्रियनिग्रहः।
धीर्विद्या सत्यमक्रोधो दशकं धर्मलक्षणम्॥




🕉 श्लोक का अर्थ

धैर्य (धृति), क्षमा, इंद्रियों पर नियंत्रण (दम), चोरी न करना (अस्तेय), शुद्धता (शौच), इंद्रियनिग्रह, बुद्धि (धी), विद्या, सत्य और क्रोध का अभाव —
ये धर्म के दस लक्षण कहे गए हैं।




🌼 प्रत्येक धर्मलक्षण की सरल व्याख्या

1. धृति (धैर्य) — कठिन समय में स्थिर रहना

धृति का अर्थ है संयम और धैर्य रखना। जीवन में चाहे कैसी भी कठिन परिस्थिति आए, जो व्यक्ति मन को स्थिर रखता है और अधर्म के मार्ग पर नहीं जाता — वही सच्चा धर्मात्मा है।




2. क्षमा — दूसरों की भूलों को माफ करना

क्षमा का अर्थ केवल भूल जाने से नहीं, बल्कि मन में द्वेष न रखना है। क्षमा से हृदय में शांति आती है और यह व्यक्ति को अहंकार से दूर रखती है।




3. दम — इंद्रियों पर नियंत्रण रखना

दम का तात्पर्य है अपनी इंद्रियों को वश में रखना। जो व्यक्ति अपनी दृष्टि, वाणी और आचरण को नियंत्रित कर लेता है, वही आत्मसंयमी कहलाता है।




4. अस्तेय — चोरी या छल न करना

अस्तेय का अर्थ है जो वस्तु हमारी नहीं है, उस पर अधिकार न करना। यह केवल भौतिक चोरी तक सीमित नहीं, बल्कि विचारों, समय और भावनाओं की ईमानदारी से भी जुड़ा है।




5. शौच — आंतरिक और बाह्य शुद्धता

शौच केवल शरीर की सफाई नहीं, बल्कि मन की स्वच्छता भी है। पवित्र विचार, निर्मल हृदय और सत्य व्यवहार ही सच्चे शौच हैं।




6. इन्द्रियनिग्रह — वासनाओं पर संयम

इंद्रियों की इच्छाएँ अनंत होती हैं। उनका संयम ही जीवन को सच्चे आनंद की ओर ले जाता है। यह आत्म-शक्ति और साधना का मूल है।




7. धी — विवेकपूर्ण बुद्धि

धी का अर्थ है बुद्धि का सही उपयोग। जो व्यक्ति धर्म-अधर्म में भेद जानता है और विवेक से निर्णय लेता है, वही “धीमान” कहलाता है।




8. विद्या — सच्चा ज्ञान

विद्या केवल पुस्तकीय ज्ञान नहीं, बल्कि आत्मज्ञान है — यह समझ कि क्या सही है और क्या नहीं। विद्या मनुष्य को अंधकार से प्रकाश की ओर ले जाती है।




9. सत्य — वाणी, विचार और कर्म की सच्चाई

सत्य वह आधार है जिस पर धर्म टिका है। जो व्यक्ति वचन, मन और कर्म से सत्यनिष्ठ रहता है, वही धर्म का पालन करता है।




10. अक्रोध — क्रोध का अभाव

क्रोध मनुष्य के विवेक को नष्ट कर देता है। अक्रोध का अर्थ है शांति, सहनशीलता और प्रेम से परिस्थितियों का सामना करना।




🌺 सारांश

मनुस्मृति का यह उपदेश केवल ग्रंथों तक सीमित नहीं है; यह हमारे दैनिक जीवन के लिए भी मार्गदर्शन है।
इन दस गुणों का पालन ही सच्चा धर्म है — यही मनुष्य को देवत्व की ओर ले जाता है।




✍️ निष्कर्ष:
जो व्यक्ति धृति, क्षमा, दम, अस्तेय, शौच, इन्द्रियनिग्रह, धी, विद्या, सत्य और अक्रोध को अपने जीवन में उतार लेता है, वह धर्म के वास्तविक स्वरूप को प्राप्त करता है — और वही समाज में प्रकाश फैलाने वाला बनता है।

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