सत्कार्यवाद क्या है? जानिए

भूमिका

भारतीय दर्शन में कार्य और कारण के संबंध को समझाने के लिए अनेक सिद्धांत दिए गए हैं। इन्हीं में से एक महत्वपूर्ण सिद्धांत है सत्कार्यवाद। यह सिद्धांत बताता है कि इस सृष्टि में कोई भी कार्य अचानक उत्पन्न नहीं होता, बल्कि वह पहले से ही अपने कारण में विद्यमान रहता है।




सत्कार्यवाद का अर्थ

सत्कार्यवाद शब्द तीन भागों से मिलकर बना है –

सत् – जो पहले से मौजूद है

कार्य – परिणाम

वाद – सिद्धांत


अर्थात, कार्य अपने कारण में पहले से विद्यमान होता है।




सत्कार्यवाद की मूल धारणा

सत्कार्यवाद के अनुसार, असत् से सत् की उत्पत्ति संभव नहीं है। जो वस्तु अस्तित्व में नहीं है, वह उत्पन्न नहीं हो सकती। इसलिए किसी भी कार्य का अस्तित्व उसके कारण में पहले से ही छिपा रहता है, जो उचित समय और परिस्थितियों में प्रकट होता है।

उदाहरण के लिए –

दूध से दही बनता है, पर दही कोई नई वस्तु नहीं है।

बीज में वृक्ष पहले से मौजूद होता है।





सत्कार्यवाद किस दर्शन से संबंधित है?

सत्कार्यवाद मुख्य रूप से सांख्य दर्शन का सिद्धांत है। सांख्य दर्शन मानता है कि पूरी सृष्टि प्रकृति से विकसित हुई है और यह विकास किसी नई वस्तु की रचना नहीं, बल्कि पहले से विद्यमान तत्वों का परिवर्तन है।




सत्कार्यवाद का महत्व

यह सिद्धांत कार्य–कारण संबंध को स्पष्ट करता है।

सृष्टि को तर्कपूर्ण और व्यवस्थित रूप में समझाता है।

कर्म और परिणाम के सिद्धांत को गहराई प्रदान करता है।





निष्कर्ष

सत्कार्यवाद यह सिखाता है कि हर परिणाम का बीज उसके कारण में पहले से मौजूद होता है। सृष्टि में कुछ भी बिना आधार या बिना कारण उत्पन्न नहीं होता।

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